मंगलवार, 4 सितंबर 2018

षड़यंत्रवादी घोडा




षड़यंत्रवादी घोडा
लकड़ी का कठघरा, कठघरे में घोडा,
कचहरी में जज साहेब ने आडर्र-२ का जो मारा हथोडा,
तोड़ा-२ घोड़ा आलसी तोड़ा,(Background sound: Yawn)
तबबक-|
आडर्र की बात सुनते ही उसने दूब घास के साथ कोल्डड्रिंक थी मंगवाई,
पब्लिक खिलखिलाई, लाज ने फिर घोड़े की समझ थी लौटाई
हाथो में जब देखी हथकड़ी, घोड़ेजी को आ गई रुलाई (Background sound: उई माँ )
तबबक-|
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रोते रोते घोड़े को अपनी कहानी सब याद आई, तबबक-|
घोड़ा था घमंडी, मालीक उसका जब खुद अकेला ही चट कर गया पूरी हंड़ी,
घोड़ेजी ने तब उससे की थी हाथापाई;
पेट के चूहो ने जब तेज दौड़ लगाईं, घोड़ेजी की प्रसाद खाने की इच्छा मन में आई, तबबक-|
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घोड़ा पंहुचा आश्रम में, आश्रम में था नारायण साईं;
साईं जी ने "डूब के मर जा चुल्लू भर पानी में " गाने की पंक्तियाँ जब गुनगुनाई (Background sound: तूने राम नाम नहीं लिया जवानी में, तू डूब के मर जा चुल्लू भर पानी में)
घोड़ेजी ने चुल्लू भर पानी के लिए अपनी अंजुली फैलाई, पर उसके हाथो में तो पानी की दो बुँदे भी नही समाई;
घोड़े को इतनी शर्म आई की तबबक-, घोड़ा दौड़ा-२ दूम उठा के दौड़ा|
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घोड़ा पंहुचा बिच पे, बिच पे था मुन्नाभाई;
बंगले पे उनके हिथयारो की डीलीवरी थी आई,
मुन्नाभाई ने अपनी AK47 जब लहराई ,
घोड़ा दौड़ा-२ दूम उठा के दौड़ा, तबबक-|
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घोड़ा पंहुचा फूटपाथ पे, खाली जगह देख के घोड़े को सुस्ती आई,
घोड़ा पंहुचा गहरी नींद में, इतने में ही फूटपाथ पे भाई की गाडी चढ़ आई,
घोड़े को तो खरोच भी नहीं थी आई, पर घोड़ा दौड़ा-२ दूम उठा के दौड़ा, तबबक-|
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घोड़ा पंहुचा एअरपोर्ट पे, सोचा बहुत रह लिए हिंदुस्तान में,
एअरपोर्ट पे था स्मगलर, स्मगलर ने कोकीन की डीलीवरी थी मंगवाई;
इतने में जाने कहाँ से चल दी पुरवाई, और घोड़े को बेहोशी थी फिर छाई|
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जज साहेब ने घोड़े को आरोपो की लिस्ट फिर सुनाई,
घोड़ेजी, तुमने नारायण साईं के कमरे में लड़कियां थी पहुचाई ,
घोड़ेजी, तुमने मुन्नाभाई की AK47 थी गलाई,
घोड़ेजी, तुमने भाई की लैंडक्रूजर थी चलाई,
घोड़ेजी, तुमने फरदीन खान को कोकीन की थी सप्लाई|
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ये सुन के घोड़े ने मुंडी लटकाई, जज ने सोचा घोड़े ने दे दी अपनी सफाई;
जज बोला तुमने कानून की धज्जियाँ उड़ाई, फिर देश छोड़ने की टीकिट थी कटवाई;
अब तुमको नहीं मिलेगी रिहाई, जज ने घोड़े को उमरकैद की सजा फिर सुनाई| फि...
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तबबक-२ घोडा दौड़ा-२ दूम उठा के दौड़ा

आओ कभी पतीली पे


कभी वीरान खंडहरों में रहा करने वाले भुतो के आजकल अच्छे दिन आ गए है और वो  आजकल हवेलियों पे रहने और बुलाने लगे हैंऐसे ही आधुनिक भूतो को समर्पित चन्द पंक्तियाँ


आओ कभी पतीली पे
   
    ओ तेरे संग यारा,
    मै लाइफ बनारा
    तू रात डरानी,
    मै मरघट सा सन्नाटा|
ओ मैने बदन पकाया हैं,
तुझे खाने पे जो बुलाया हैं,
तुझपे मरके ही,
तो मुझे भूत बनना आया हैं|
    ओ तेरे संग यारा,
    मै लाइफ बनारा
    तू रात डरानी,
    मै मरघट सा सन्नाटा|
ओ कितने पापड़ बेले,
ओ कितना पसीना बहाया;
तुझे मस्का लगाने के वास्ते,
मैने कितनो को टपकाया|

ओ तुझसे मिलने को,
मैने पार्टी का मूड बनाया;
ताज़ा शिकार का भी,
मैने जुगाड़ लगाया |
    ओ तेरे संग यारा,
    मै लाइफ बनारा;
    नरक से भी मुर्दे उठा आऊँ,
    जो तू करदे इशारा |